कई लोग मनु के प्रमाण से सिद्ध करते है वृक्ष शरीर और योनि है वेसे वहा उस शब्द का अर्थ स्वामी दर्शानंद जी ने लक्षणा से स्थावरस्थ योनि किया है | स्वामी दयानंद सरस्वती जी आर्याविभंव १/७/१२/५ में स्थावर का अर्थ जगत अप्राणित जड किया है | अब कोई हठ करे की वृक्ष पर रहने वाले कीट नही बल्कि वृक्ष ही उसका अर्थ है तो मनु १२/४८ में नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्विक गति : से नक्षत्र भी योनि होती है जो सात्विक गति है बताया है अब क्या नक्षत्र भी योनि है या तो नक्षत्र को योनि माने या फिर नक्षत्रस्थ मानकर वृक्ष की तरह लक्षणा की जाए | और वेसे मनु स्मृति की पुनर्जन्म वाली यह योनि का क्रम भी सही नही है देखिये - " तुरंगान्च शुद्रा ......तामसी गति: (१२/४३ ) अर्थात शुद्र और सूअर तामसी गति है | इससे पूर्व १२/ ४० में लिखा है - " मनुष्यत्वन्च राजसा " अर्थात मनुष्य रजस योनि है | यहा ध्यान देने वाली बात है क्या शुद्र मनुष्य नही? जब मनुष्य है तो उसे तमस में क्यूँ ? और इसे मानने पर सनातनी ब्राह्मणों का सिद्धांत कि वर्ण का परिवर्तन इस जन्म में नही बल्कि अगले जन्म में होता है मानना पड़ेगा क्यूंकि यहा शुद्र का वर्ण किसी को अगले जन्म में मिला है | अत: यह क्षेपित है इसलिए इसमें ऐसी गडबड है इसलिए यह इस विषय में हमारा स्पष्ट मार्गदर्शन नही कर सकती है | और स्मृति का मुख्य विषय आत्मा ,जीव का दर्शन समझाना भी नही है वह तो उपांगो से ही स्पष्ट होगा | शरीर अर्थात योनि क्या है ? यह न्याय दर्शन में लिखा है - " चेष्टेन्द्रियार्थाश ्रय: शरीरम " हित प्राप्ति तथा अहित के परिहाररूप चेष्टा ,इन्द्रिय एवं अर्थ के आधार को शरीर कहते है | अर्थात शरीर में इन्द्रिया है लेकिन वृक्षों को शरीर मानने वाले भी वृक्ष में इन्द्रिय नही मानते है | इससे भी सिद्ध हुआ कि वृक्ष उक्त परिभाषानुसार शरीर नही है |
हमे इसका स्पष्ट उलेख वैशेषिक दर्शन के ऋषि प्रशस्तपाद द्वारा किये हुए भाष्य से मिलता है जिसे ध्यानपूर्वक पढ़े -
" त्रिविध चास्य कार्य शरीरेन्द्रियविष यसंज्ञकम |
तत्र शरीर द्विविध योनिजमयोनिज च | तत्र योनिजमनपेक्षितश ुक्र -शोणितदेवऋषिशरी रधर्मविशेषसहिते भ्योsणुभ्यो जायन्ते ||
क्षुद्रजन्तूना यातनाशरीरान्यधर ्मविशेषसहितेभ्य ोsणूभ्यो जायते |
शुक्रशोणितसन्नि पातज योनिज तच्च द्विविधम |
जरायुजमंडजन्च |मानुषपशुमृगाणा जरायुजम |
पक्षिसरीसृपाणाण ्डजम |
इन्द्रिय गंधकव्यंजक सर्वप्राणिना जलादयभिभूते: पार्थिवावेरारब् ध घ्राणम |
विषयवस्तु द्वणुकादिप्रक्र मेणरब्धस्त्रीवि धो मृत्पाषाणस्थावर लक्षण :| तत्र भूप्रदेश :|
प्राकारेष्टिकाद यो मृद्विकारा पाषाण उपलमणिवज्राद्य: स्थावरास्तृणगुल ्मौषधितरुलताजात ि वनस्पतय इति |"
अर्थ - कार्य जगत तीन प्रकार का है - (१) शरीर अथवा योनि जिसे भोगायतन भी कहते है |(२) इन्द्रीय जिसे भोग साधन कहते है | (३) विषय जिसे भोग कहते है |
शरीर दो प्रकार का होता है - योनिज और अयोनिज अर्थात जो माता पिता के बीज से उत्पन्न हो दुसरा जो बिना माता पिता के बीज से उत्पन्न हो जो गुणविशेषवाले परमाणु से उत्पन्न हो जेसे आदि सृष्टि में ऋषियों का शरीर जो कि सृष्टि के आदि में ईश्वर की व्यवस्था से हुआ | दूसरा योनिज जो माता पिता के रज वीर्य से उत्पन्न हुआ हो यह दो प्रकार का होता है - (१) जरायुज - जो जेर से उत्पन्न हो जेसे मनुष्य ,पशु ,मृग आदि दूसरा अण्डज -जो अन्डो से पैदा हो जेसे मछली ,सर्प पक्षी आदि | अब शरीर का विभाग समाप्त कर इन्द्रियों का लक्षण कहते है पृथ्वी और जल आदि के गुणों गंध और स्वाद आदि का ज्ञान कराने वाली जेसे घ्राण आदि इन्द्रिया है | अब इन्द्रियों को छोड़ विषय अर्थात भोग बताते है ,विषय परमाणु से द्विणु होकर संयोग से तीन प्रकार का बनता है -
(१) मिटटी (२) पाषाण (३) स्थावर
प्रथ्वी पर रहने वाली घड़ी हुई ईट,भूमि रूप प्रदेश आदि जितने भी विकार है सब मिटटी ही कहलाते है |
साधारण पाषाण, मणि (जेसे अयस्कांत मणि जिसे चुम्बक भी कहते है ) से लेकर हीरा नीलम आदि पाषाण में गणना है |
और स्थावर अर्थात घास ,बैल ,लता यह सब स्थावर है |
यहा देखिये प्रशस्त पाद मुनि ने स्थावर अर्थात वृक्ष को शरीर नही माना है बल्कि विषय माना है यदि शरीर मानते तो उसकी शरीर में गणना करते ण कि जड विषयों में | अत: वृक्ष शरीर नही विषय है | और शरीर न होने से योनि भी नही है |
हमे इसका स्पष्ट उलेख वैशेषिक दर्शन के ऋषि प्रशस्तपाद द्वारा किये हुए भाष्य से मिलता है जिसे ध्यानपूर्वक पढ़े -
" त्रिविध चास्य कार्य शरीरेन्द्रियविष
तत्र शरीर द्विविध योनिजमयोनिज च | तत्र योनिजमनपेक्षितश
क्षुद्रजन्तूना यातनाशरीरान्यधर
शुक्रशोणितसन्नि
जरायुजमंडजन्च |मानुषपशुमृगाणा
पक्षिसरीसृपाणाण
इन्द्रिय गंधकव्यंजक सर्वप्राणिना जलादयभिभूते: पार्थिवावेरारब्
विषयवस्तु द्वणुकादिप्रक्र
प्राकारेष्टिकाद
अर्थ - कार्य जगत तीन प्रकार का है - (१) शरीर अथवा योनि जिसे भोगायतन भी कहते है |(२) इन्द्रीय जिसे भोग साधन कहते है | (३) विषय जिसे भोग कहते है |
शरीर दो प्रकार का होता है - योनिज और अयोनिज अर्थात जो माता पिता के बीज से उत्पन्न हो दुसरा जो बिना माता पिता के बीज से उत्पन्न हो जो गुणविशेषवाले परमाणु से उत्पन्न हो जेसे आदि सृष्टि में ऋषियों का शरीर जो कि सृष्टि के आदि में ईश्वर की व्यवस्था से हुआ | दूसरा योनिज जो माता पिता के रज वीर्य से उत्पन्न हुआ हो यह दो प्रकार का होता है - (१) जरायुज - जो जेर से उत्पन्न हो जेसे मनुष्य ,पशु ,मृग आदि दूसरा अण्डज -जो अन्डो से पैदा हो जेसे मछली ,सर्प पक्षी आदि | अब शरीर का विभाग समाप्त कर इन्द्रियों का लक्षण कहते है पृथ्वी और जल आदि के गुणों गंध और स्वाद आदि का ज्ञान कराने वाली जेसे घ्राण आदि इन्द्रिया है | अब इन्द्रियों को छोड़ विषय अर्थात भोग बताते है ,विषय परमाणु से द्विणु होकर संयोग से तीन प्रकार का बनता है -
(१) मिटटी (२) पाषाण (३) स्थावर
प्रथ्वी पर रहने वाली घड़ी हुई ईट,भूमि रूप प्रदेश आदि जितने भी विकार है सब मिटटी ही कहलाते है |
साधारण पाषाण, मणि (जेसे अयस्कांत मणि जिसे चुम्बक भी कहते है ) से लेकर हीरा नीलम आदि पाषाण में गणना है |
और स्थावर अर्थात घास ,बैल ,लता यह सब स्थावर है |
यहा देखिये प्रशस्त पाद मुनि ने स्थावर अर्थात वृक्ष को शरीर नही माना है बल्कि विषय माना है यदि शरीर मानते तो उसकी शरीर में गणना करते ण कि जड विषयों में | अत: वृक्ष शरीर नही विषय है | और शरीर न होने से योनि भी नही है |
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