इस सन्धर्भ में तर्क वितर्क बहुत चलते है ,हठता के कारण या अन्य कारण से एक दुसरे के तर्को का निषेध होता रहता है | इसलिए अब अनुमान और प्रत्यक्ष को छोड़ शब्द प्रमाण देते है| क्यूंकि आस्तिक वैदिक दर्शन वालो को प्रत्यक्ष ,अनुमान ,शब्द तीनो प्रमाण स्वीकार है | जबकि बोद्धो को प्रत्यक्ष और अनुमान और नास्तिको को केवल प्रत्यक्ष इस दृष्टि से समस्त आस्तिक जनों को इन प्रमाणों पर विचार करना चाहिए |
स्वत प्रमाण वेद से प्रमाण देते है और उसकी व्याख्या आप्त पुरुष ऋषि पेप्लाद और ऋषि ऐतरय महिदास जी के प्रमाणों से करेंगे -
ऋग्वेद १०/१२०/२ में निम्न मन्त्र आया है -
" वावृधान : शवसा भूर्योजा: शत्रुर्दासाय भियस दधाति |
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि स नवन्ते प्रभृता मदेषु इति ||
इस मन्त्र की प्रतीकि दे कर ऐतरय आरंडयक १/३/७ में आया है -
" अव्यनच्च व्यनच्च सस्नीति यच्च प्राणी यच्चाप्राणकमित् येव तदाह इति " अर्थात वावृधान शवसा ऋग्वेद के इस मन्त्र में व्यनत से प्राणधारण करने वाले और अव्यनत से प्राण न धारण करने वाले दो जगत का ग्रहण होता है इन सबका पोषक सूर्य ही है |
अब ये प्राण धारण करने वाले और न करने वाले कौन है ? इसका भी प्रमाण इसी आरंडयक के १/३/४ में मिलता है -
विशेषेणानिति चेष्टत व्यन्त्प्रानोपत जंगममव्यनत्प्रा णरहित स्थावर " अर्थात प्राण धारण करने वाले जंगम जीव विशेष और प्राण रहित स्थावर आदि जड विशेष |
इस तरह मन्त्र की व्याख्या करते हुए ऐतरय ऋषि वृक्षों आदि को प्राण रहित बता रहे है | प्रश्नोंपनिषद में आश्वालायन मुनि का पुत्र कौशल्य ऋषि अपने विद्यार्थी अवस्था में पैप्लाद मुनि से प्रश्न करते है - " कुत एष प्राणों जायते ? " अर्थात शरीर में प्राण किससे उत्पन्न होता है ? -प्रश्न. ३/३० इसका उत्तर पैप्लाद मुनि देते है - " आत्मन: एष: प्राण: जायते " -प्रश्न ३/३२ अर्थात शरीर में प्राण आत्मा से होता है |
इन दोनों प्रमाणों से सिद्ध होता है वृक्ष को प्राण रहित कहा है किसी भी शरीर में प्राण का कारण आत्मा है अत: प्राण रहित वृक्ष में आत्मा का निषेध हो जाता है |
इसके आलावा ऋषि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में ८१ वी समीक्षा में वृक्ष जो जड है ऐसा स्पष्ट लिखा है |
छान्दोग्योपनिषद ् के अस्य सौम्यमहतो वृक्षस्य इत्यादि भाग पर भाष्य में शंकराचार्य लिखते है - " बौद्धमतेस्थावरा श्चेतना ' कणाद तु स्थावरा जड़ा अर्थात बोद्ध मत में स्थावर चेतन है और कणाद के मत में स्थावर जड (इस पर मैंने कल प्रशस्त पाद भाष्य दे कर भी पुष्टि की थी ) है |
आस्तिक होने से सम्भवत: शंकराचार्य जी कणाद से सहमत होंगे |
स्वत प्रमाण वेद से प्रमाण देते है और उसकी व्याख्या आप्त पुरुष ऋषि पेप्लाद और ऋषि ऐतरय महिदास जी के प्रमाणों से करेंगे -
ऋग्वेद १०/१२०/२ में निम्न मन्त्र आया है -
" वावृधान : शवसा भूर्योजा: शत्रुर्दासाय भियस दधाति |
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि स नवन्ते प्रभृता मदेषु इति ||
इस मन्त्र की प्रतीकि दे कर ऐतरय आरंडयक १/३/७ में आया है -
" अव्यनच्च व्यनच्च सस्नीति यच्च प्राणी यच्चाप्राणकमित्
अब ये प्राण धारण करने वाले और न करने वाले कौन है ? इसका भी प्रमाण इसी आरंडयक के १/३/४ में मिलता है -
विशेषेणानिति चेष्टत व्यन्त्प्रानोपत
इस तरह मन्त्र की व्याख्या करते हुए ऐतरय ऋषि वृक्षों आदि को प्राण रहित बता रहे है | प्रश्नोंपनिषद में आश्वालायन मुनि का पुत्र कौशल्य ऋषि अपने विद्यार्थी अवस्था में पैप्लाद मुनि से प्रश्न करते है - " कुत एष प्राणों जायते ? " अर्थात शरीर में प्राण किससे उत्पन्न होता है ? -प्रश्न. ३/३० इसका उत्तर पैप्लाद मुनि देते है - " आत्मन: एष: प्राण: जायते " -प्रश्न ३/३२ अर्थात शरीर में प्राण आत्मा से होता है |
इन दोनों प्रमाणों से सिद्ध होता है वृक्ष को प्राण रहित कहा है किसी भी शरीर में प्राण का कारण आत्मा है अत: प्राण रहित वृक्ष में आत्मा का निषेध हो जाता है |
इसके आलावा ऋषि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में ८१ वी समीक्षा में वृक्ष जो जड है ऐसा स्पष्ट लिखा है |
छान्दोग्योपनिषद
आस्तिक होने से सम्भवत: शंकराचार्य जी कणाद से सहमत होंगे |
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